सोनम वांगचुक के अनशन के बीच फिर चर्चा में आए पोत्ती श्रीरामुलु, जिनके बलिदान ने बदल दिया था भारत का नक्शा

सोनम वांगचुक के जारी भूख हड़ताल आंदोलन के बीच देश में एक बार फिर स्वतंत्रता सेनानी पोत्ती श्रीरामुलु के ऐतिहासिक अनशन और उनके बलिदान की चर्चा तेज हो गई है। उनका आंदोलन भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

नई दिल्ली: पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का भूख हड़ताल आंदोलन लगातार चर्चा में बना हुआ है। इसी बीच इतिहास के पन्नों से एक ऐसा नाम फिर सामने आया है, जिसने अपने अनशन और बलिदान से भारत के राजनीतिक मानचित्र को नई दिशा दी थी। यह नाम है स्वतंत्रता सेनानी पोत्ती श्रीरामुलु का।

पोत्ती श्रीरामुलु महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने सामाजिक समानता, दलित अधिकारों और तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। वर्ष 1952 में उन्होंने अलग आंध्र राज्य की मांग के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया। कई सप्ताह तक चले इस अनशन के बाद उनका निधन हो गया, जिसके बाद व्यापक जनआंदोलन खड़ा हुआ।

जनदबाव बढ़ने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अलग आंध्र राज्य के गठन की घोषणा की। इसके बाद 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य अस्तित्व में आया। यह घटना आगे चलकर पूरे देश में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया का आधार बनी। वर्ष 1956 में राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के लागू होने के साथ भारत के कई राज्यों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।

वर्तमान समय में जब सोनम वांगचुक अपने मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण अनशन कर रहे हैं, तब पोत्ती श्रीरामुलु का ऐतिहासिक संघर्ष फिर से चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि दोनों आंदोलनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को सामने रखने के लिए अहिंसक अनशन का मार्ग अपनाया।

इतिहासकारों का मानना है कि पोत्ती श्रीरामुलु का बलिदान भारतीय लोकतंत्र में जनआंदोलनों की शक्ति का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उनके संघर्ष ने न केवल आंध्र राज्य के गठन का रास्ता खोला, बल्कि देशभर में भाषाई पहचान के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को भी गति दी।